कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा

चौपाई ३, दोहा २४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥ भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥ ३ ॥

अर्थ

हँसी चन्द्रमा की किरणों का तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ऊँचे] चौड़े ललाट पर तिलक झलक रहे हैं (दीप्तिमान् हो रहे हैं)। [काले घुँघराले] बालों को देखकर भौंरों की पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।

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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश