सिय सोभा नहिं जाइ बखानी

चौपाई १, दोहा २४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥ १ ॥

अर्थ

रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिये मुझे [काव्य की] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियों के अंगों से अनुराग रखनेवाली हैं (अर्थात्‌ वे जगत्‌ की स्त्रियों के अंगों से ली जाती हैं)। [काव्य की उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत्‌ से ली गयी हैं, उन्हें भगवान्‌ की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजी के अप्राकृत, चिन्मय अंगों के लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपने को उपहासास्पद बनाना है]।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।

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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश