प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे
प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे
चौपाई १, दोहा २४५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे॥ असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥ १ ॥
अर्थ
प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गये (निराश एवं उत्साहहीन हो गये) जैसे पूर्ण चन्द्रमा के उदय होने पर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। [उनके तेज को देखकर] सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।
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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश