जौं छबि सुधा पयोनिधि होई
चौपाई ४, दोहा २४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छपु सोई॥ सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू॥ ४ ॥
अर्थ
[जिन लक्ष्मीजी की बात ऊपर कही गयी है वे निकली थीं खारे समुद्र से, जिसको मथने के लिये भगवान् ने अति कर्कश पीठवाले कच्छप का रूप धारण किया, रस्सी बनायी गयी महान् विषधर वासुकि नाग की, मथानी का कार्य किया अतिशय कठोर मन्दराचल पर्वत ने और उसे मथा सारे देवताओं और दैत्यों ने मिलकर। जिन लक्ष्मी को अतिशय शोभा की खान और अनुपम सुन्दरी कहते हैं, उनको प्रकट करने में हेतु बने ये सब असुन्दर एवं स्वाभाविक ही कठोर उपकरण। ऐसे उपकरणों से प्रकट हुई लक्ष्मी श्रीजानकीजी की समता को कैसे पा सकती हैं। हाँ, इसके विपरीत] यदि छबिरूपी अमृत का समुद्र हो, परम रूपमय कच्छप हो, शोभारूप रस्सी हो, श्रृंगार [रस] पर्वत हो और [उस छबि के समुद्र को] स्वयं कामदेव अपने ही करकमल से मथे,
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।