प्रान कंठगत भयउ भुआलू
प्रान कंठगत भयउ भुआलू
चौपाई १, दोहा १५४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू॥ इंद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी॥ १ ॥
अर्थ
राजा के प्राण कण्ठ में आ गये। मानो मणि के बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जल के सरोवर में कमलों का वन मुरझा गया हो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र-दशरथ संवाद और राम-वियोग में दशरथ का देहावसान का वर्णन है।
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दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान