तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब

छन्द, दोहा १५१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

छन्द पाठ

तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं॥ जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी। तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी॥

अर्थ

हे पिताजी! आपके अनुग्रह से मैं वन जाते हुए सब सुख पाऊँगा। आज्ञा का भलीभाँति पालन करके कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा। सब माताओं को संतुष्ट करके, उनके पैरों पड़-पड़कर बहुत विनती करके—तुलसीदास कहते हैं—तुम वही प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान” प्रकरण का छन्द, दोहा १५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र-दशरथ संवाद और राम-वियोग में दशरथ का देहावसान का वर्णन है।

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दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान