हा रघुनंदन प्रान पिरीते

चौपाई ४, दोहा १५५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥ हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥ ४ ॥

अर्थ

हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर ! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ !

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र-दशरथ संवाद और राम-वियोग में दशरथ का देहावसान का वर्णन है।

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दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान