बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा
चौपाई ३, दोहा १५१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा॥ तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू॥ ३ ॥
अर्थ
मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले—हे तात! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओर से बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र-दशरथ संवाद और राम-वियोग में दशरथ का देहावसान का वर्णन है।
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दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान