ओर निबाहेहु भायप भाई
ओर निबाहेहु भायप भाई
चौपाई ३, दोहा १५२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥ तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥ ३ ॥
अर्थ
और हे भाई! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात! राजा (पिताजी) को उसी प्रकार से रखना जिससे वे कभी (किसी तरह भी) मेरा सोच न करें।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुमंत्र-दशरथ संवाद और राम-वियोग में दशरथ का देहावसान का वर्णन है।
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दशरथ-सुमंत्र संवाद और दशरथ का देहावसान