निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा

चौपाई २, दोहा १२५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥ सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥ २ ॥

अर्थ

पर्वत, नदी और वन के [सुन्दर] विभागों को देखकर नारदजी का लक्ष्मीपति भगवान् के चरणों में प्रेम हो गया। भगवान् का स्मरण करते ही उन (नारद मुनि) के शाप की (जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापति ने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते थे) गति रुक गयी और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गयी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीरामावतार के हेतु” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीरामावतार के कारणों और रावण-कुम्भकर्ण के जन्म के हेतु का वर्णन है।

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श्रीरामावतार के हेतु