मुनि सुसीलता आपनि करनी

चौपाई २, दोहा १२७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥ सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥ २ ॥

अर्थ

देवराज इन्द्र की सभा में जाकर उसने मुनि की सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मन में आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनि की प्रशंसा करके श्रीहरि को सिर नवाया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीरामावतार के हेतु” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीरामावतार के कारणों और रावण-कुम्भकर्ण के जन्म के हेतु का वर्णन है।

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श्रीरामावतार के हेतु