हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि
दोहा २२३ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद। जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥ २२३ ॥
अर्थ
सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ समूह-समूह हृदय में हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं। जहाँ-जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ-वहाँ परम आनन्द छा जाता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण” प्रकरण का दोहा २२३ है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा जनकपुर भ्रमण और नगरवासियों के मुग्ध होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण