कानन्हि कनक फूल छबि देहीं
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं
चौपाई ४, दोहा २१९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥ चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥ ४ ॥
अर्थ
कानों में सोने के कर्णफूल अत्यन्त शोभा दे रहे हैं और देखते ही देखने वाले के चित्त को मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। माथे पर तिलक की रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो शोभा पर मुहर लगा दी गयी हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २१९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा जनकपुर भ्रमण और नगरवासियों के मुग्ध होने का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण