बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी

चौपाई ४, दोहा २२० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥ अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही॥ ४ ॥

अर्थ

भगवान् विष्णु के चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजी के चार मुख हैं, शिवजी का विकट वेष है और उनके पाँच मुख हैं। हे सखी! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ इस छबि की उपमा दी जाय।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा जनकपुर भ्रमण और नगरवासियों के मुग्ध होने का वर्णन है।

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श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण