सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित
दोहा २२५ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ। गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥ २२५ ॥
अर्थ
फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोच के साथ दोनों भाई गुरु के चरणकमलों में सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण” प्रकरण का दोहा २२५ है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा जनकपुर भ्रमण और नगरवासियों के मुग्ध होने का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण