जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी

चौपाई ४, दोहा २२३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥ तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं॥ ४ ॥

अर्थ

जिस ब्रह्मा ने सीता को सँवारकर (बड़ी चतुराई से) रचा है, उसी ने विचारकर साँवला वर भी रच रखा है। उसके ये वचन सुनकर सब हर्षित हुईं और कोमल वाणी से कहने लगीं—ऐसा ही हो।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा जनकपुर भ्रमण और नगरवासियों के मुग्ध होने का वर्णन है।

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श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण