चापत चरन लखनु उर लाएँ
चापत चरन लखनु उर लाएँ
चौपाई ४, दोहा २२६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥ पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥ ४ ॥
अर्थ
श्रीरामजी के चरणों को हृदय से लगाकर भय और प्रेम सहित परम सुख पाकर लक्ष्मणजी उन्हें दबा रहे हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने बार-बार कहा--हे तात! [अब] सो जाओ। तब वे उन चरणकमलों को हृदय में धरकर लेट रहे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा जनकपुर भ्रमण और नगरवासियों के मुग्ध होने का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण