सिय पितु मातु सनेह बस बिकल
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल
दोहा २८६ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि॥ २८६ ॥
अर्थ
पिता-माता के प्रेम के मारे सीताजी ऐसी विकल हो गयीं कि अपने को सँभाल न सकीं। [परन्तु परम धैर्यवती] पृथ्वी की कन्या सीताजी ने समय और सुन्दर धर्म का विचार कर धैर्य धारण किया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का दोहा २८६ है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील