लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल

दोहा २८२ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥ २८२ ॥

अर्थ

कौसल्याजी ने दुःखभरे हृदय से कहा--श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन में जायें, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरत की चिन्ता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का दोहा २८२ है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील