सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति

दोहा २८१ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल॥ २८१ ॥

अर्थ

अमृत केवल सुनने में आता है और विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। विधाता की सभी करतूतें भयडूर हैं। जहाँ-तहाँ कौए, उल्लू और बगुले ही [दिखायी देते] हैं; हंस तो एक मानसरोवर में ही है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का दोहा २८१ है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील