कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि

दोहा २८३ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥ २८३ ॥

अर्थ

कौसल्याजी ने फिर धीरज धरकर कहा-हे देवि मिथिलेशि! सुनिये, ज्ञान के भण्डार श्रीजनकजी की प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है ?।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का दोहा २८३ है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील