एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं
चौपाई १, दोहा २८१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं॥ सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं॥ १ ॥
अर्थ
इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [सुनने वालों के] मनों को हर लेते हैं। उसी समय सीताजी की माता श्रीसुनयनाजी की भेजी हुई दासियाँ [कौसल्याजी आदि के मिलने का] सुन्दर अवसर देखकर आयीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील