जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी

चौपाई २, दोहा २८७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥ गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे॥ २ ॥

अर्थ

तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गंगाजी को भी जीतकर [जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है] करोड़ों ब्रह्माण्डों में बह चली है। गंगाजी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों (हरिद्वार, प्रयागराज और गंगासागर) को बड़ा (तीर्थ) बनाया है। पर तेरी इस कीर्तिनदी ने तो अनेकों संतसमाजरूपी तीर्थस्थान बना दिये हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील