कौसल्या कह दोसु न काहू

चौपाई २, दोहा २८२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥ कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥ २ ॥

अर्थ

कौसल्याजी ने कहा--किसी का दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्म के अधीन हैं। कर्म की गति कठिन (दुर्विज्ञेय) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलों का देनेवाला है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील