पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी

चौपाई ३, दोहा २८७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी॥ पुनि पितु मातु लीन्हि उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई॥ ३ ॥

अर्थ

पिता जनकजी ने तो स्नेह से सच्ची सुन्दर वाणी कही। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोच में समा गयीं। पिता-माता ने उन्हें फिर हृदय से लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशीष दी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील