सब सिय राम प्रीति कि सि
सब सिय राम प्रीति कि सि
चौपाई ४, दोहा २८१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति। जनु करुना बहु बेष बिसूरति॥ सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी॥ ४ ॥
अर्थ
सभी श्रीसीतारामजी के प्रेम की मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत-से वेष (रूप) धारण करके विसूर रही हो (दुःख कर रही हो)। सीताजी की माता सुनयनाजी ने कहा-विधाता की बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूध के फेन-जैसी कोमल वस्तु को वज्र की टाँकी से फोड़ रहा है (अर्थात् जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उन पर विपत्ति-पर-विपत्ति ढहा रहा है)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील