सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ
चौपाई ४, दोहा २८४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ॥ देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती॥ ४ ॥
अर्थ
सारा रनिवास देखकर थकित रह गया (निस्तब्ध हो गया), तब सुमित्राजी ने धीरज धरके कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील