चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु

चौपाई ४, दोहा २८६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥ मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की॥ ४ ॥

अर्थ

जनकजी का ज्ञानरूपी चिरंजीवी मुनि व्याकुल होकर डूबते-डूबते मानो उस श्रीराम-प्रेमरूपी बालक का सहारा पाकर बच गया। वस्तुतः [ज्ञानिशिरोमणि] विदेहराज की बुद्धि मोह में मग्न नहीं है। यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है [जिसने उन-जैसे महान् ज्ञानी के ज्ञान को भी विकल कर दिया]।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील