ईस रजाइ सीस सबही कें
ईस रजाइ सीस सबही कें
चौपाई ३, दोहा २८२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें॥ देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी॥ ३ ॥
अर्थ
ईश्वर की आज्ञा सभी के सिर पर है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लय (संहार) तथा अमृत और विष के भी सिर पर है (ये सब भी उसी के अधीन हैं)। हे देवि! मोह वश सोच करना व्यर्थ है। विधाता का प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील