लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी

चौपाई ३, दोहा २८४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी॥ नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि॥ ३ ॥

अर्थ

कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियाँ करुणरस में निमग्र हो गयीं। आकाश से पुष्पवर्षा की झड़ी लग गयी और धन्य-धन्य की ध्वनि होने लगी। सिद्ध, योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गये।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील