तापस बेष जनक सिय देखी
तापस बेष जनक सिय देखी
चौपाई १, दोहा २८७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥ पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥ १ ॥
अर्थ
सीताजी को तपस्विनी-वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और सन्तोष हुआ। [उन्होंने कहा-] बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये। तेरे निर्मल यश से सारा जगत् उज्ज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील