उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू
चौपाई ३, दोहा २८६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥ सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा॥ ३ ॥
अर्थ
उनके हृदय में [वात्सल्य] प्रेम का समुद्र उमड़ पड़ा। राजा का मन मानो प्रयाग हो गया। उस समुद्र के अंदर उन्होंने [आदिशक्ति] सीताजी के [अलौकिक] स्नेहरूपी अक्षयवट को बढ़ते हुए देखा। उस (सीताजी के प्रेमरूपी बट) पर श्रीरामजी का प्रेमरूपी बालक (बालरूपधारी भगवान्) सुशोभित हो रहा है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील