कहति न सीय सकुचि मन माहीं

चौपाई ४, दोहा २८७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥ लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥ ४ ॥

अर्थ

सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु मन में सकुचा रही हैं कि रात में [सासुओं की सेवा छोड़कर] यहाँ रहना अच्छा नहीं है। रानी सुननयनाजी ने जानकीजी का रुख देखकर (उनके मन की बात समझकर) राजा जनकजी को जना दिया। तब दोनों अपने हृदयों में सीताजी के शील और स्वभाव की सराहना करने लगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील