ईस प्रसाद असीस तुम्हारी

चौपाई १, दोहा २८३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी॥ राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ॥ १ ॥

अर्थ

ईश्वर के अनुग्रह और आपके आशीर्वाद से मेरे [चारों] पुत्र और [चारों] बहुएँ गंगाजी के जल के समान पवित्र हैं। हे सखी ! मैंने कभी श्रीरामजी की शपथ नहीं की, सो आज श्रीरामजी की शपथ करके सत्य भाव से कहती हूँ--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील