भरत सील गुन बिनय बड़ाई
भरत सील गुन बिनय बड़ाई
चौपाई २, दोहा २८३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई॥ कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥ २ ॥
अर्थ
भरत के शील, गुण, विनय, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और भलाई का वर्णन करने में सरस्वतीजी की बुद्धि भी हिचकती है। सीप से कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं ?।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।
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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील