तौ भल जतनु करब सुबिचारी

चौपाई २, दोहा २८४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी॥ गूढ़ सनेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं॥ २ ॥

अर्थ

तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरत का अत्यधिक सोच है। भरत के मन में गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहने में मुझे भलाई नहीं जान पड़ती (यह डर लगता है कि उनके प्राणों को कोई भय न हो जाय)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कौसल्या-सुनयना संवाद में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत धर्म की महिमा का वर्णन है।

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कौसल्या-सुनयना संवाद, सीता का शील