जौं करनी समुझै प्रभु मोरी
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी
चौपाई ३, दोहा १ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥ जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥ ३ ॥
अर्थ
यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें, तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पों तक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता। [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवक के अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभाव के हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन