बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस
दोहा १ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ १ (ख) ॥
अर्थ
हनुमानजी ने दुर्बल शरीर भरतजी को जटाओं का मुकुट बनाये, राम! राम! रघुपति! जपते और कमल के समान नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहाते कुश के आसन पर बैठे देखा।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का दोहा १ (ख) है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन