राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि
दोहा ३ (ग) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान। बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥ ३ (ग) ॥
अर्थ
श्रीरघुनाथजी पूर्णिमा के चन्द्रमा हैं, और अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्र को देखकर हर्षित हो रहा है। बढ़ता हुआ कोलाहल करती स्त्रियाँ मानो उसकी तरंगों के समान हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का दोहा ३ (ग) है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन