मंगलाचरण

उत्तरकाण्ड का आरंभ मंगलमय वंदना से होता है, जिसमें प्रभु, गुरु और संतों की स्तुति कर कथा के लिए पवित्र भावभूमि बनाई जाती है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १ / २१

प्रकरण पाठ

श्लोक

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्‌। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्‌॥ १ ॥

अर्थ:

मोर के कण्ठ की आभा के समान नीलवर्ण, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथों में बाण और धनुष धारण किये हुए, वानरसमूह से युक्त, भाई लक्ष्मणजी से सेवित, स्तुति किये जाने योग्य, श्रीजानकीजी के पति, रघुकुलश्रेष्ठ, पुष्पकविमान पर सवार श्रीरामचन्द्रजी को मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ।

श्लोक

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ। जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ॥ २ ॥

अर्थ:

कोसलपुरी के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर और कोमल दोनों चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं, श्रीजानकीजी के करकमलों से दुलराये हुए हैं और चिन्तन करनेवाले के मनरूपी भौरे के नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करनेवाले का मनरूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलों में बसा रहता है।

श्लोक

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्‌। कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमोचनम्‌॥ ३ ॥

अर्थ:

कुन्द के फूल, चन्द्रमा और श्वेत रंग के समान सुन्दर गौरवर्ण, जगज्जननी श्रीपार्वतीजी के पति, वांछित फल के देनेवाले, [दुःखियों पर सदा] दया करनेवाले, सुन्दर कमल के समान नेत्रवाले, कामदेव से छुड़ानेवाले, [कल्याणकारी] श्रीशङ्करजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

दोहा

रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग। जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥ १ ॥

अर्थ:

[ श्रीरामजी के लौटने की] अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगर के लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे हैं। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं [कि क्या बात है, श्रीरामजी क्यों नहीं आये]।

दोहा

सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर। प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर॥ २ ॥

अर्थ:

इतने में ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गये। नगर भी चारों ओर से रमणीक हो गया। मानो ये सब-के-सब चिह्न प्रभु के [शुभ] आगमन को जना रहे हैं।

दोहा

कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ। आयउ प्रभु श्री अनुजजुत कहन चहत अब कोइ॥ ३ ॥

अर्थ:

कौसल्या आदि सब माताओं के मन में ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आ गये।

दोहा

भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मन में अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे--।