मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई

चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥ बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥ ४ ॥

अर्थ

अतएव मेरे हृदय में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जाने पर यदि मेरे प्राण रह गये, तो जगत में मेरे समान अधम कौन होगा?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।

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भरत विरह, हनुमान आगमन