दीनबंधु रघुपति कर किंकर

चौपाई ५, दोहा २ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥ मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवत जल पुलकित गाता॥ ५ ॥

अर्थ

मैं दीनों के बन्धु श्रीरघुनाथजी का दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमानजी से गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता। नेत्रों से [आनन्द और प्रेम के आँसुओं का] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत विरह, हनुमान आगमन