राम बिरह सागर महँ भरत मगन

दोहा १ (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥ १ (क) ॥

अर्थ

श्रीरामजी के विरह-सागर में भरतजी का मन डूब रहा था, उसी समय पवनपुत्र हनुमानजी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [उन्हें डूबने से बचाने के लिए] नाव आ गयी हो।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का दोहा १ (क) है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।

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भरत विरह, हनुमान आगमन