को तुम्ह तात कहाँ ते आए
को तुम्ह तात कहाँ ते आए
चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥ मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥ ४ ॥
अर्थ
हे तात! तुम कौन हो? और कहाँ से आये हो, [जो] तुमने मुझे [ये] परम प्रिय (अत्यन्त आनन्द देनेवाले) वचन सुनाये। [हनुमानजी ने कहा--] हे कृपानिधान! सुनिये, मैं पवन का पुत्र और जाति का वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन