कपि तव दरस सकल दुख बीते
कपि तव दरस सकल दुख बीते
चौपाई ६, दोहा २ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते॥ बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता॥ ६ ॥
अर्थ
हे हनुमानजी! तुम्हारे दर्शन से मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दुःखों का अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूप में] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये। भरतजी ने बार-बार कुशल पूछी [और कहा--] हे भाई! सुनो, [इस शुभ संवाद के बदले में] तुम्हें क्या दूँ?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन