निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम

छन्द, दोहा २ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्‌यो। सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्‌यो॥ रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो। काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥

अर्थ

रघुवंश के भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दास की भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजी के अत्यन्त विनीत वचन सुनकर हनुमानजी पुलकित शरीर होकर उनके चरणों पर गिर पड़े [और मन में विचारने लगे कि] जो चराचर के स्वामी हैं, वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुख से जिनके गुणसमूहों का वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का छन्द, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।

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भरत विरह, हनुमान आगमन