जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं

चौपाई ४, दोहा ३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥ एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥ ४ ॥

अर्थ

जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशा में) वे वैसे ही (वहीं से उसी दशा में) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जाने के डर से] बालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरे से पूछते हैं--भाई ! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजी को देखा है ?।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत विरह, हनुमान आगमन