अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी
चौपाई ४, दोहा ४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥ हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥ ४ ॥
अर्थ
यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि और मेरे परमधाम को देनेवाली है। प्रभु की वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवध की स्वयं श्रीरामजी ने बड़ाई की, वह [अवश्य ही] धन्य है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन