भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ
सोरठा २ (ख) · उत्तरकाण्ड
सोरठा पाठ
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं। कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥ २ (ख) ॥
अर्थ
फिर भरतजी के चरणों में सिर नवाकर हनुमानजी तुरंत ही श्रीरामजी के पास [लौट] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमान पर चढ़कर चले।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का सोरठा २ (ख) है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।
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भरत विरह, हनुमान आगमन