तब हनुमंत नाइ पद माथा

चौपाई ८, दोहा २ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥ कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥ ८ ॥

अर्थ

हनुमानजी ने भरतजी के चरणों में मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजी की सारी गुणगाथा कही। [भरतजी ने पूछा--] हे हनुमानजी! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “भरत विरह, हनुमान आगमन” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत के विरह, हनुमान के शुभ आगमन और अयोध्या में हर्ष का वर्णन है।

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भरत विरह, हनुमान आगमन